Pravasi Mithila

17.2.10

नहि सोभैया रंगदारी

अहॉं विदेहक छी संतान राखु याज्ञवल्क्यक मान
नहि बिसरू मंडन, ंअयाची
वाचस्पति, विद्यापति केर नाम
गौरब-गाथा सॅ पूर्ण धरा पर
नहि करू एकरा संग गद्दारी
नहि सोभौया रंगदारी

हमर ज्ञान संस्कृतिक चर्चा
हाई छल जग में सदिखन
छल षिक्षाक केन्द्र बनल
पसरल नहि षिक्षाक किरण जखन
आई ठाड़ छी निम्न पॉंतिमें
नहि करू षिक्षाक व्यपारी
नहि सोभौया रंगदारी

कियो बनल स्वर्णक पक्षघर
किया बनल अवर्णक नेता
आपस में सब ‘ाडयंत्र रचिके
एक-दोसराक संग लड़ेता
अहॉं सॅ मिथिला तंग भ गेल
छोरू आब जातिक ठीकेदारी
नहि सोभौया रंगदारी

बाढिंक मारल रौदीक झमारल
जनता के आब कतेक ठकब
गाम-घर सब छोरी परायल
अहॉ आब ककरा लुटब
भलमानुश किछु डटल गाम में
नहि फुकु घर में चिंगारी

आबो जागु आबो चेतु
कहिया धरि अहॉं सुतल रहब
देखु दुनियॉ चांद पर चली गेल
अहॉं आबों कहिया उठब
अहीं सनक भायक खातिर
कनैत छथि वैदेही बेचारी
नहि सोभौया रंगदारी



रचनाकार:- दयाकान्त

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