10.10.11

अन्‍नपूर्णाक उपासना पर्व थीक “कोजगरा”




पूनम झा
शरद ऋतु आश्विन माँसक पुर्णिमा तिथि (11 अक्टूबर) कए दूधसन उज्जर ठहाठहि इजोरियाक एहि राति कए कोजगराक राति नाम सँ ख्याति प्राप्त कयने, पावनि सम्पूर्ण मिथिलांचल मे महा चर्चा एवं उत्साह-उमंगक संग मनाओल जाइत अछि बंगाल मे एकरा लख्‍‍खी पूजा सेहो कहल जाइत अछि। मिथिला मे एहि दिन लक्ष्मीक अन्नपूर्णा रूप पूजा होइत अछि। मिथिला मे एहि दिन पचेसी (लूडो पुरान रूप) खेलेबाक रिवाज अछि। जुआ रूपी खेल सेहो एहि दिन बहुत लोक खेलाइत अछि।


की छि कोजगरा
एहि राति कए मूलतः जागरण राति मानल जाइत अछि,तैं एकर नाम जगरा भेल के जगति छथि तैं को जगरा भय गेल समस्त मिथिला शक्ति पीठ मानल जाइत अछि एहि कड़ी सँ जोरल एकटा पद्धति मिथिलाक परम्परा वनि गेल अछि, जे कोनो शुभ कार्य वा पूजन मे पहिने ओहि स्थल पर जतय शुभ कार्य होयतैक अरिपण देल जाईत अछि स्थान के चिकठानि माँटि सँ नीपि कय चाउर के पीसल पीठार सँ अरिपण के चित्रकारी कयल जाइत अछि जनिका मांझ ठाम सिन्दुर के रेख सँ पहिने गोसाओन के स्थान सुरक्षित राखि-ओही चित्र पर समयानुसार शुभ कार्य कयल जाईत अछि अरिपण पर पुरहर राखव आर्थिक सम्पन्नता तथा पुरहर पर दीप जरायव सुखद समृद्धि के द्योतक मानल जाईत अछि कोजगरा पर्व मुख्य रुप से आर्थिक सम्पन्नता हेतु आश्विन पुर्णिमा के रात्रि मे जागरण कय लक्ष्मीक अराधना मे लीन रहवाक अछि शास्त्रोचित वात अछि, जे एहि राति लक्ष्मीक पूजन विधान करी वा नहि एकर मान्यता कम अछि, मुदा जौ एहि राति के कोनो रुपे जागि कय गमावी, तऽ लक्ष्मी के प्रसन् करवाक साधन मानल गेल अछि
अगहन सँ अषाढ़ तक जे नव दम्पत्ति के विआह होइत छैन्हि हुनकर कोजगरा आश्विन मासक पुर्णिमा के राति मे मनाओल जाईत अछि प्रतिवर्ष नव दम्पत्ति के कोजगरा होईत अछि, अर्थात विआहक बाद कोजगरा अवैत अछि होइत छैक जे कान्यापक्ष ओतय सँ वर पक्षक परिवारक वर (दुल्हा) सहित सभ सदस्य के नव वस्त्र संग मे चूड़ा दही, केरा मिठाई पर्याप्त मरवान के १०-२० भार साजि कय, किंवा भरियाक कमी रहला सँ स्थानीय कोनो व्यवस्था सँ पहुंचायल जाइत अछि चूड़ा, दही, केरा, मिठाई जे कन्यापक्षक ओतय सँ अबैत छैक, ओकर भोज अपना समाजिक सम्बन्ध के मुताबिक वर पक्षक ओतय होइत अछि, संगे समस्त परिवार नव वस्त्र (जे कन्या पक्ष सँ अवैत अछि) धारण करैत छथि आंगन के माँझठाम अरिपन देल जाइत अछि, तथा ओहि पर आसन दय वर के चुमाओन कएल जाइत अछि तदुपरान्त दुर्वाक्षत सँ वर के दीर्घ आयु के मंगल कामना करैत गोसाओन के गोहरवति स्त्रीगण समाज वर के गोसाओन के अराधना मे लऽ जाईत छथि। वर गोसाओन के मनाय कय अपना सँ श्रेष्ट पुरजन, परिजन एवं समाज के चरण स्पर्श करैत छथि तथा सुभाशिष प्राप्त करैत छथि एहि पावनि मे वर पक्ष समाजक हर समुदाय के लोक के हकार दय अपना ओहिठाम वजाबति छाथि तथा सनेस मे आयल मखान एवं वताशा (मिठाई) मिलाकय प्रयाप्त रुपेण बाँटि कय पान सपारी दय विदा करैत छाथि एहि पावनि मे मखानक प्रधानता अछि मखान एक प्रकारक विशिष्ट मेवा फल अछि किशमिश, काजू, नारिकेर एवं अन्य कोनो मेवा मे जे पौष्टिक तत्व पायल जाइत अछि, मखान मे एकसरे सभ पौष्टिक तत्व छैक मिथिलाक जे भौगोलिक संरचना अछि, एहि मे जलक जमाव श्रोत वेसी छैक जतय पर्याप्त मात्रा मे पोखरि धार नम्हर-नम्हर झील डावर आदि जल जमाव स्थल अछि, ततय मखान होइत अछि

मिथिलाक भू-भाग पर मरवानक उपज आदि काल सँ जतेक होईत अछि ओतेक उपज एहि विशिष्ट मेवा आओरो कोनो ठाम नहि अछि अखाढ़क अन्त तक मरवान के नवका फसिल पानि सँ निकालि साओन भादव मास तक एकर लावा ;अग कयल जाइत अछि गाम घर सँ वजारक दुकान तक मे मेवा वहुतायक रुप मे भेटैत छैक चूँकि एहि क्षेत्र के विशिष्ट मेवा फल जीवन के अति विशिष्ट तत्व के पूर्ण करय वला फलक उपज अधिक होइत अछि, संगहि वर्षा ऋतु के कुप्रभाव सँ मानव जीवन मे अनेकानेक रोग के संचार होइत छैक जाहि बहुत रोगक निवारण के क्षमता मखान मे छैक मखान सुपाच्य मेवा अछि तथा एकर सेवन अपच, कम भूख, पेटक अन्य गड़बड़ी, शक्ति के संचार मे अत्यन्त लाभदाई अछि मखान के घी मे भूजि कय भूजाक रुप मे एवं एकर खीर बना कय खयला सँ शरीरक संतुलित अहार के कमी तत्व के पूरा करैत अछि एकर सेवन, आशिन कार्तिक मास मे अति लाभदाई छैक, तै समाजक लोक के स्वास्थ्य के मंगल मामना करैत एहि पावनि मे मखान बाँटय के प्रथा प्रचलित भेल अछि पान सुपारी मिथिलाक सम्मान मे अति विशिष्ट स्थान प्राप्त कयने अछि , तै पान सुपारी दय समाजक सम्मान कयल जाइत अछि तदुपरान्त राति भरि जागरण करवा हेतु पचीसी खेल, नाच गान के आयोजन कयल जाइत अछि एहि तरहे राति भरि चहल पहल मे वीति जाईत अछि एना जागरण मे महत्व गौण अछि, तै एकर प्रधानता कम आंकल जाईत अछि मुदा एहि रातुक जागरण लक्ष्मी प्राप्ति मे सिद्धि दाई अछि एहि पावनि के महत्व दिनानुदिन मिथिला मे घटल जाईत अछि, मुदा एकर रश्य अदायगी अवश्य होईत अछि (साभार : मिथिला लाइव )

31.8.11

मिथिलाक लोक पावनि चौरचन : कलंकित चान देखबाक परंपरा

समस्त विज्ञजन केँ विदित अछि जे समग्र विश्‍व मे भारत ज्ञान विज्ञान सँ महान तथा जगत्‌ गुरु कऽ उपाधि सँ मण्डित अछि । एतवे टा नहि भारत पूर्व काल मे सोनाक चिड़ियामानल जाइत छल एवं ब्रह्माण्डक परम शक्‍ति छल । भूलोकक कोन कथा अन्तरिक्ष लोक मे एतौका राजा शान्ति स्थापित करऽ लेल अपन भुज शक्‍तिक उपयोग करैत छलाह । एकर साक्ष्य अपन पौराणिक कथा ऐतिह्‌य प्रमाणक रुप मे स्थापित अछि।

हमर पूर्वज जे आई ऋषि महर्षि नाम सँ जानल जायत छथि हुनक अनुसंधानपरक वेदान्त (उपनिषद्‍) एखनो अकाट्‍य अछि । हुनक कहब छनि काल (समय) एक अछि, अखण्ड अछि, व्यापक (सब ठाम व्याप्त) अछि । महाकवि कालिदास अभिज्ञान शकुन्तलाक मंगलाचरण मे ये द्वे कालं विधतःएहि वाक्य द्वारा ऋषि मत केँ स्थापित करैत छथि । जकर भाव अछि व्यवहारिक जगत्‌ मे समयक विभाग सूर्य आओर चन्द्रमा सँ होइछ ।

प्रश्नोपनिषद्‍ मे ऋषिक मतानुसार परम सूक्ष्म तत्त्व आत्मासूर्य छथि तथा सूक्ष्म गन्धादि स्थूल पृथ्वी आदि प्रकृति चन्द्र छथि । एहि दूनूक संयोग सँ जड़ चेतन केँ उत्पत्ति पालन आओर संहार होइछ ।

आत्यिमिक बौद्धिक उन्‍नति हेतु सूर्यक उपासना कैल जाइछ । जाहि सँ ज्ञान प्राप्त होइछ । ज्ञान छोट ओ पैघ नहि होइछ अपितु सब काल मे समान रहैछ एवं सतत ओ पूर्णताक बोध करवैछ । मुक्‍तिक साधन ज्ञान, आओर मुक्‍त पुरुष केँ साध्यो ज्ञाने अछि । सूर्य सदा सर्वदा एक समान रहैछ । ठीक एकरे विपरीत चन्द्र घटैत बढ़ैत रहैछ । ओ एक कलाक वृद्धि करैत शुक्ल पक्ष मे पूर्ण आओर एक-एक कलाक ह्रास करैत कृष्ण पक्ष मे विलीन भऽ जाय्त छाथि । सम्पत्सर रुप (समय) जे परमेश्‍वर जिनक प्रकृति रुप जे प्रतीक चन्द्र हुनक शुक्ल पक्ष रुप जे विभाग ओ प्राण कहवैछ प्राणक अर्थ भोक्‍ता । कृष्ण पक्ष भोग्य (क्षरण शील वस्तु) ।

विश्‍वक समस्त ज्योतिषी लोकनि जातकक जन्मपत्री मे सूर्य आओर चन्द्र केँ वलावल केँ अनुसार जातक केर आत्मबल तथा धनधान्य समृद्धिक विचार करैत छथिन्ह ।

वैज्ञानिक लोकनि अपना शोध मे पओलैन जे चन्द्रमाक पूर्णता आओर ह्रास्क प्रभाव विक्षिप्त (पागल) क विशिष्टता पर पड़ैछ । भारतीय दार्शनिक मनीषी कोकं कस्त्वं कुत आयातः, का मे जनजी को तात:अर्थात्‌ हम के छी, अहाँ के छी हमर माता के छथि तथा हमर पिता के छथि इत्यादि प्रश्नक उत्तर मे प्रत्यक्ष सूर्य के पिता (पुरुष) आओर चन्द्रमा के माता (स्त्री) क कल्पना कऽ अनवस्था दोष सं बचैत छथि ।

अपना देश मे खास कऽ हिन्दू समाज मे जे अवतारवादक कल्पना अछि ताहि मे सूर्य आओर चन्द्रक पूर्णावतार मे वर्णन व्यास्क पिता महर्षि पराशर अपन प्रसिद्ध ग्रन्थ वृद्ध पराशरमे करैत छथि । रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकःसृ. क्र. २६ अर्थात्‌ सूर्य राम रुप मे आओर चन्द्र कृष्ण रुप मे अवतार ग्रहण केलन्हि ।

ई दुनू युग पुरुष भारतीय संस्कृति-सभ्यता, आचार-विचार तथा जीवन दर्शनक मेरुद्ण्ड छथि आदर्श छथि । पौराणिक ग्रन्थ तथा काव्य ग्रन्थ केँ मान्य नायक छथि । कवि, कोविद, आलोचक, सभ्य विद्धत्‌ समाजक आदर्श छथि । सामान्यजन हुनका चरित केँ अपना जीवन मे उतारि ऐहिक जीवन के सुखी कऽ परलोक केँ सुन्दर बनाबऽ लेल प्रयत्‍नशील होईत छथि ।

एहि संसार मे दू प्रकारक मनुष्य वास करै छथि । एकटा प्रवृत्ति मार्गी (प्रेय मार्गी)- गृहस्थ दोसर निवृत्ति मार्गी योगी, सन्यासी । प्रवृत्ति मार्गी-गृहस्थ काञ्चन काया कामिनी चन्द्रमुखी प्रिया धर्मपत्‍नी सँ घर मे स्वर्ग सुख सँ उत्तम सुखक अनुभव करै छथि । ओहि मे कतहु बाधा होइत छनि तँ नरको सँ बदतर दुःख केँ अनुभव करै छथि ।

कर्मवादक सिद्धान्तक अनुसार सुख-दुःख सुकर्मक फल अछि ई भारतीय कर्मवादक सिद्धान्त विश्‍वक विद्धान स्वीकार करैत छथि । तकरा सँ छुटकाराक उपाय पूर्वज ऋषि-मुनि सुकर्म (पूजा-पाठ) भक्‍ति आओर ज्ञान सँ सम्वलित भऽ कऽ तदनुसार आचरणक आदेश करैत छथिन्ह ।

हम जे काज नहि केलहुँ ओकरो लेल यदि समाज हमरा दोष दिए, प्रत्यक्ष वा परोक्ष मे हमर निन्दा करय एहि दोष लोक लाक्षनाक निवारण हेतु भादो शुक्ल पक्षक चतुर्थी चन्द्र के आओर ओहि काल मे गणेशक पूजाक उपदेश अछि ।

हिन्दू समाज मे श्री कृष्ण पूर्णावतार परम ब्रह्म परमेश्‍वर मानल छथि । महर्षि पराशर हुनका चन्द्रसँ अवतीर्ण मानैत छथिन्ह । हुनके सँ सम्बन्धित स्कन्दपुराण मे चन्द्रोपाख्यान शीर्षक सँ कथा वर्णित अछि जे निम्नलिखित अछि

नन्दिकेश्‍वर सनत्कुमार सँ कहैत छथिन्ह हे सनत कुमार ! यदि अहाँ अपन शुभक कामना करैत छी तऽ एकाग्रचित सँ चन्द्रोपाख्यान सुनू । पुरुष होथि वा नारी ओ भाद्र शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र पूजा करथि । ताहि सँ हुनका मिथ्या कलंक तथा सब प्रकार केँ विघ्नक नाश हेतैन्ह । सनत्कुमार पुछलिन्ह हे ऋषिवर ! ई व्रत कोना पृथ्वी पर आएल से कहु । नन्दकेश्‍वर बजलाह-ई व्रत सर्व प्रथम जगत केर नाथ श्री कृष्ण पृथ्वी पर कैलाह । सनत्कुमार केँ आश्‍चर्य भेलैन्ह षड गुण ऐश्‍वर्य सं सम्पन्‍न सोलहो कला सँ पूर, सृष्टिक कर्त्ता धर्त्ता, केना लोकनिन्दाक पात्र भेलाह । नन्दीकेश्‍वर कहैत छथिन्ह-हे सनत्कुमार । बलराम आओर कृष्ण वसुदेव क पुत्र भऽ पृथ्वी पर वास केलाह । ओ जरासन्धक भय सँ द्वारिका गेलाह ओतऽ विश्‍वकर्मा द्वारा अपन स्त्रीक लेल सोलह हजार तथा यादव सब केँ लेल छप्पन करोड़ घर केँ निर्माण कऽ वास केलाह । ओहि द्वारिका मे उग्र नाम केर यादव केँ दूटा बेटा छलैन्ह सतजित आओर प्रसेन । सतजित समुद्र तट पर जा अनन्य भक्‍ति सँ सूर्यक घोर तपस्या कऽ हुनका प्रसन्‍न केलाह । प्रसन्‍न सूर्य प्रगट भऽ वरदान माँगूऽ कहलथिन्ह सतजित हुनका सँ स्यमन्तक मणिक याचना कयलन्हि । सूर्य मणि दैत कहलथिन्ह हे सतजित ! एकरा पवित्रता पूर्वक धारण करव, अन्यथा अनिष्ट होएत । सतजित ओ मणि लऽ नगर मे प्रवेश करैत विचारऽ लगलाह ई मणि देखि कृष्ण मांगि नहि लेथि । ओ ई मणि अपन भाई प्रसेन के देलथिन्ह । एक दिन प्रंसेन श्री कृष्ण के संग शिकार खेलऽ लेल जंगल गेलाह । जंगल मे ओ पछुआ गेलाह । सिंह हुनका मारि मणि लऽ क चलल तऽ ओकरा जाम्बवान्‌ भालू मारि देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ ओ लऽ अपना वील मे प्रवेश कऽ खेलऽ लेल अपना पुत्र केऽ देलथिन्ह ।

एम्हर कृष्ण अपना संगी साथीक संग द्वारिका ऐलाह । ओहि समूहक लोक सब प्रसेन केँ नहि देखि बाजय लगलाह जे ई पापी कृष्ण मणिक लोभ सँ प्रसेन केँ मारि देलाह । एहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण व्यथित भऽ चुप्पहि प्रसेनक खोज मे जंगल गेलाह । ओतऽ देखलाह प्रदेन मरल छथि । आगू गेलाह तऽ देखलाह एकटा सिंह मरल अछि आगू गेलाह उत्तर एकटा वील देखलाह । ओहि वील मे प्रवेश केलाह । ओ वील अन्धकारमय छलैक । ओकर दूरी १०० योजन यानि ४०० मील छल । कृष्ण अपना तेज सँ अन्धकार के नाश कऽ जखन अंतिम स्थान पर पहुँचलाह तऽ देखैत छथि खूब मजबूत नीक खूब सुन्दर भवन अछि । ओहि मे खूब सुन्दर पालना पर एकटा बच्चा के दायि झुला रहल छैक बच्चा क आँखिक सामने ओ मणि लटकल छैक दायि गवैत छैक:-

सिंहः प्रसेन भयधीत, सिंहो जाम्बवता हतः ।

सुकुमारक ! मा रोदीहि, तब ह्‌येषः स्यमन्तकः ॥

अर्थात्‌ सिंह प्रसेन केँ मारलाह, सिंह जाम्बवान्‌ सँ मारल गेल, ओ बौआ ! जूनि कानू अहींक ई स्यमन्तक मणि अछि । तखनेहि एक अपूर्व सुन्दरी विधाताक अनुपम सृष्टि युवती ओतऽ ऐलीह । ओ कृष्ण केँ देखि काम-ज्वर सँ व्याकुल भऽ गेलीह । ओ बजलीह-हे कमल नेत्र ! ई मणि अहाँ लियऽ आओर तुरत भागि जाउ । जा धरि हमर पिता जाम्बवान्‌ सुतल छथि । श्री कृष्ण प्रसन्‍न भऽ शंख बजा देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ उठैत्मात्र युद्ध कर लगलाह । हुनका दुनुक भयंकर बाहु युद्ध २१ दिन तक चलैत रहलन्हि । एम्हर द्वारिका वासी सात दिन धरि कृष्णक प्रतीक्षा कऽ हुनक प्रेतक्रिया सेहो देलथिन्ह । बाइसम दिन जाम्बवान्‌ ई निश्‍चित कऽ कि ई मानव नहि भऽ सकैत छथि । ई अवश्य परमेश्‍वर छथि । ओ युद्ध छोरि हुनक प्रार्थना केलथिन्ह अ अपन कन्या जाम्बवती के अर्पण कऽ देलथिन्ह । भगवान श्री कृश्न मणि लऽ कऽ जाम्ब्वतीक स्म्ग सभा भवन मे आइव जनताक समक्ष सत्जीत के सादर समर्पित कैलाह । सतजीत प्रसन्‍न भऽ अपन पुत्री सत्यभामा कृष्ण केँ सेवा लेल अर्पण कऽ देलथिन्ह ।

किछुए दिन मे दुरात्मा शतधन्बा नामक एकटा यादव सत्ताजित केँ मारि ओ मणि लऽ लेलक । सत्यभामा सँ ई समाचार सूनि कृष्ण बलराम केँ कहलथिन्ह-हे भ्राता श्री ! ई मणि हमर योग्य अछि । एकर शतधन्वान लेऽ लेलक । ओकरा पकरु । शतधन्वा ई सूनि ओ मणि अक्रूर कें दऽ देलथिन्ह आओर रथ पर चढ़ि दक्षिण दिशा मे भऽ गेलाह । कृष्ण-बलराम १०० योजन धरि ओकर पांछा मारलाह । ओकरा संग मे मणि नहि देखि बलराम कृष्ण केँ फटकारऽ लगलाह, “हे कपटी कृष्ण ! अहाँ लोभी छी ।कृष्ण केँ लाखों शपथ खेलोपरान्त ओ शान्त नहि भेलाह तथा विदर्भ देश चलि गेलाह । कृष्ण धूरि केँ जहन द्वारिका एलाह तँ लोक सभ फेर कलंक देबऽ लगलैन्ह । ई कृष्ण मणिक लोभ सँ बलराम एहन शुद्ध भाय के फेज छल द्वारिका सँ बाहर कऽ देलाह । अहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण संतप्त रहऽ लगलाह । अहि बीच नारद (ओहि समयक पत्रकार) त्रिभुवन मे घुमैत कृष्ण सँ मिलक लेल ऐलथिन्ह । चिन्तातुर उदास कृष्ण केँ देखि पुछथिन्ह हे देवेश ! किएक उदास छी ?” कृष्ण कहलथिन्ह, ” हे नारद ! हम वेरि वेरि मिथ्यापवाद सँ पीड़ित भऽ रहल छी ।नारद कहलथिन्ह, “हे देवेश ! अहाँ निश्‍चिते भादो मासक शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र देखने होएव तेँ अपने केँ बेरिबेरि मिथ्या कलंक लगैछ । श्री कृष्ण नारद सँ पूछलथिन्ह, “चन्द्र दर्शन सँ किएक ई दोष लगै छैक ।

नारद जी कहलथिन्ह, “जे अति प्राचीन काल मे चन्द्रमा गणेश जी सँ अभिशप्त भेलाह, अहाँक जे देखताह हुनको मिथ्या कलंक लगतैन्ह । कृष्ण पूछलथिन्ह, “हे मुनिवर ! गणेश जी किऐक चन्द्रमा केँ शाप देलथिन्ह ।नारद जी कहलथिन्ह, “हे यदुनन्दन ! एक वेरि ब्रह्मा, विष्णु आओर महेश पत्नीक रुप मे अष्ट सिद्धि आओर नवनिधि के गनेश कें अर्पण कऽ प्रार्थना केयथिन्ह । गनेश प्रसन्न भऽ हुनका तीनू कें सृजन, पालन आओर संहार कार्य निर्विघ्न करु ई आशीर्वाद देलथिन्ह । ताहि काल मे सत्य लोक सँ चन्द्रमा धीरे-धीरे नीचाँ आबि अपन सौन्द्र्य मद सँ चूर भऽ गजवदन कें उपहाल केयथिन्ह । गणेश क्रुद्ध भऽ हुनका शाप देलथिन्ह, – “हे चन्द्र ! अहाँ अपन सुन्दरता सँ नितरा रहल छी । आई सँ जे अहाँ केँ देखताह, हुनका मिथ्या कलंक लगतैन्ह । चन्द्रमा कठोर शाप सँ मलीन भऽ जल मे प्रवेश कऽ गेलाह । देवता लोकनि मे हाहाकार भऽ गेल । ओ सब ब्रह्माक पास गेलथिन्ह । ब्रह्मा कहलथिन्ह अहाँ सब गणेशेक जा केँ विनति करु, उएह उपय वतौताह । सव देवता पूछलन्हि-गणेशक दर्शन कोना होयत । ब्रह्मा वजलाह चतुर्थी तिथि केँ गणेश जी के पूजा करु । सब देवता चन्द्रमा सँ कहलथिन्ह । चन्द्रमा चतुर्थीक गणेश पुजा केलाह । गणेश वाल रुप मे प्रकट भऽ दर्शन देलथिन्ह आओर कहलथिन्ह चन्द्रमा हम प्रसन्‍न छी वरदान माँगू । चन्द्रमा प्रणाम करैत कहलथिन्ह हे सिद्धि विनायक हम शाप मुक्‍त होई, पाप मुक्‍त होई, सभ हमर दर्शन करैथ । गनेश थ बहलाघ हमर शाप व्यर्थ नहि जायत किन्तु शुक्ल पक्ष मे प्रथम उदित अहाँक दर्शन आओर नमन शुभकर रहत तथा भादोक शुक्ल पक्ष मे चतुर्थीक जे अहाँक दर्शन करताह हुनका लोक लान्छना लगतैह । किन्तु यदि ओ सिंहः प्रसेन भवधीत इत्यादि मन्त्र केँ पढ़ि दर्शन करताह तथा हमर पूजा करताह हुनका ओ दोष नहि लगतैन्ह । श्री कृष्ण नारद सँ प्रेरित भऽ एहिव्रतकेँ अनुष्ठान केलाह । तहन ओ लोक कलंक सँ मुक्‍त भेलाह ।

एहि चौठ तिथि आओर चौठ चन्द्र केँ जनमानस पर एहन प्रभाव पड़ल जे आइयो लोक चौठ तिथि केँ किछु नहि करऽ चाहैत छथि । कवि समाजो अपना काव्य मे चौठक चन्द्रमा नीक रुप मे वर्णन नहि करैत छथि । कवि शिरोमणि तुलसी मानसक सुन्दर काण्ड मे मन्दोदरी-रावण संवाद मे मन्दोदरीक मुख सँ अपन उदगार व्यक्‍त करैत छथि – “तजऊ चौथि के चन्द कि नाईहे रावण । अहाँ सीता केँ चौठक चन्द्र जकाँ त्याग कऽ दियहु । नहि तो लोक निंदा करवैत अहाँक नाश कऽ देतीह ।

एतऽ ध्यान देवऽक बात इ अछि जे जाहि चन्द्र केँ हम सब आकाश मे घटैत बढ़ैत देखति छी ओ पुरुष रुप मे एक उत्तम दर्शन भाव लेने अछि । जे एहि लेखक विषय नहि अछि । हमर ऋषि मुनि आओर सभ्य समाजक ई ध्येय अछि, मानव जीवन सुखमय हो आओर हर्ष उल्लास मे हुनक जीवन व्यतीत होन्हि । एहि हेतु अनेक लोक पावनि अपनौलन्हि, जाहि मे आवाल वृद्ध प्रसन्‍न भवऽ केँ परिवार समाज राष्ट्र आओर विश्‍व एक आनन्द रुपी सूत्र मे पीरो अब फल जेकाँ रहथि ।

साभार : मिथिला अरिपन

18.8.11

गीत


काका यौ.. काका यौ
हमर पढुआ काका यौ
अहाँ एहेन किया जुलुम करै छी
दै छी दिन में डाका यौ
काका यौ.. काका यौ

पढि लिखी अहाँ शहर घुमै छी
बनल छी अफसर बड़का यौ
तखनो बेटीक डर से किया
करबै छी किया अल्ट्रा यौ
काका यौ.. काका यौ

देत जखन फटकार बेटा
मोन परत तखन बेटी यौ
ओही बेटीक जनम से पहिने
पेटे में लै छी परीक्षा यौ
काका यौ.. काका यौ

देखियौ आई बेटी बेटा सँ


नहीं अछि कतहु पाँछा यौ
धरती, पैन आ अन्तरिक्ष में
फहराबै छै पताका यौ
काका यौ.. काका यौ

ऐना ज s बेटीक डर स s सबकियो
करबेतै s अल्ट्रा यौ
माय, बहिन आ पुतहुक बिना
चालत कोना सृष्टिक चक्का यौ
काका यौ.. काका यौ

21.7.11

श्री उग्रतारायै नमः

मिथिलादेशीय मकरन्दानुसार

मैथिली पञ्चांग

१४१९ (२०११-२०१२ ई०) सालक पर्व सूची

श्रावनक सोम व्रत १८-०७-२०११

मौना पंचमी २०-०७-२०११

मधुश्रावणी २०-०७-२०११

नागपंचमी ०४-०८-२०११

शीतला सप्तमी ०६-०८-२०११

तुलसी दास जयंती ०६-०८-२०११

रक्षा वन्धन १३-०८-२०११

कज्जली तृतीया १६-०८-२०११

हलधर षष्ठी १९-०८-२०११

भादरी रवि ब्रत २१-०८-२०११

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी २१-०८-२०११

कुशी अमावश्या २९-०८-२०११

तीज व्रत ३१-०८-२०११

चौठ चन्द्र ०१-०९-२०११

ऋषि पंचमी ०२-०९-२०११

राधा अष्टमी ०५-०९-२०११

अनंत पूजा ११-०९-२०११

अगस्त तर्पण १२-०९-२०११

पितृपक्ष १३-०९-२०११

जितिया व्रत २०-०९-२०११

मात्री नवमी २१-०९-२०११

शारदीय नवरात्र आरम्भ २८-०९-२०११

बेलनोती ०२-१०-२०११

महाष्टमी व्रत ०५-१०-२०११

विजया दसमी ०६-१०-२०११

कोजगरा ११-१०-२०११

करवा चौथ १५-१०-२०११

धनतेरस २४-१०-२०११

दीपावली २६-१०-२०११

भ्रात्री द्वितीया २८-१०-२०११

छैठ खरना ३१-१०-२०११

छैठ ०१-११-२०११

सामा पूजा ०२-११-२०११

अक्षय नवमी ०४-११-२०११

देवुथान एकादशी ०६-११-२०११

कार्तिक पूर्णिमा १०-११-२०११

रवि व्रत आरम्भ २६-११-२०११

विवाह पंचमी २९-११-२०११

माघ मास स्नान १५-०१-२०१२

नरक निवारण चतुर्दसी २१-०१-२०१२

मौनी अमावस्या २३-०१-२०१२

सरस्वती पूजा २८-०१-२०१२

वसंत पंचमी २८-०१-२०१२

माघी पूर्णिमा ०७-०२-२०१२

महा शिवरात्रि २०-०२-२०१२

होली ०९-०३-२०१२

राम नवमी ०१-०४-२०१२

सतुऐन १३-०४-२०१२

जुरिशितल १४-०४-२०१२

अक्षय तृतीया २४-०४-२०१२

जानकी नवमी ३०-०४-२०१२

बैसाखी पूर्णिमा ०६-०५-२०१२

बट शावित्री २०-०५-२०१२

गंगा दसहरा ३०-०५-२०१२

गुरु पूर्णिमा ०३-०७-2012

एकादशी व्रत

कामदा एकादशी -२६ जुलाई

पुत्रदा ९ अगस्त

जया २५ अगस्त

कर्म-धर्मा ८ सितम्बर

इंदिरा २३ सितम्बर

पशंकुश ६ अक्टूबर

रम्भा २३ अक्टूबर

देवुथान ६ नवम्बर

उन्पन्ना २१ नवम्बर

मोक्षदा ६ दिसम्बर

सफला २१ दिसम्बर

पुत्रदा ५ जनबरी २०१२

पततिला १९ जनबरी

भौमि ३ फरबरी

विजया १६ फरबरी

आमलकी ४ मार्च

पापमोचनी १८ मार्च

कामदा ३ अप्रैल

वरूथिनी १६ अप्रैल

विजया २ मई

आपरा १६ मई

निर्जला ३१ मई

योगिनी १५ जून

हरिशयन ३० जून

शुभ विवाह

नवम्बर २०११ सं जून २०१२ तक

नवम्बर -२० ,२१, २३, २५, २६,३०

दिसंबर -१,,

जनबरी - १८, १९, २०, २३, २५, २६, २९

फरबरी - २, , , , १०, १६, १७, १९, २३, २४, २९

मार्च - , , , १२

अप्रैल -१५, १६, १८, २५, २६

जून - ८, १३, २४, २५, २८, २९

उपनयनक दिन

फरबरी(2012) - 2, 3, 24, 26
मार्च - 4
अप्रैल - १, , २६
जून -२२

मुंडन क़े दिन

२०११-२०१२

जून -८, २१, २२, २९ मई -४, २३, २५, ३१ अप्रैल २६ जनबरी-२०१२ - २५, २६, ३०

दिसंबर - १,

जनबरी - २०१२- २५, २६, ३०

फरबरी -३, २६

अप्रैल - २६

मई - ४, २३, २५, ३१

जून - ८, २१, २२, २९

गृह प्रवेशक शुभ दिन (२०११-२०१२)

अगस्त - ३, , , , , १०, ११

नवम्बर - २, , , ,

दिसंबर -१

मार्च-२०१२ - २, ,

अप्रैल - २६, २८

मई - ३,

जून - २८, २९, ३०

१४१९ (२००९-२०१० ई०) सालक पर्व सूची
(मिथिलादेशीय मकरन्दानुसार)

मौना पंचमी १२ जुलाई
मधुश्रावणी व्रत २४ जुलाई
नागपंचमी २६ जुलाई
रक्षाबन्धन ५ अगस्त
जन्माष्टमी व्रत १३ अगस्त
कृष्णाष्टमी व्रत १४ अगस्त
कुशी अमावश्या २० अगस्त
हरितालिका व्रत २३ अगस्त
चौठचन्द्र व्रत २३ अगस्त
कर्मा-धर्मा ११ व्रत ३१ अगस्त
इन्द्रपूजारम्भ १ सितम्बर
अनन्त पूजा ३ सितम्बर
अगस्त्यार्घदान ४ सितम्बर
पितृपक्षारम्भ ५ सितम्बर
जिमूतवाहन व्रत ११ सितम्बर
मातृनवमी १३ सितम्बर
विश्वकर्मा पूजा १७ सितम्बर
कलशास्थापन, दूर्गा पूजा आरम्भ १९ सितम्बर
बेलनौती १४ सितम्बर
पत्रिका प्रवेश २५ सितम्बर
महाष्टमी व्रत २६ सितम्बर
महानवमी व्रत २७ सितम्बर
विजयादशमी, दशहरा २८ सितम्बर
कोजागरा ३ अक्तूबर
धनतेरस १५ अक्तूबर
(दिवाली, दीपावली या दियावाती) व श्यामा पूजा १७ अक्तूबर
अन्नकूट, गोवर्धन पूजा १८ अक्तूबर
भ्रातृ द्वितिया, चित्रगुप्त पूजा, भरदुतिया २० अक्तूबर
छठि व्रत २४ अक्तूबर
अक्षय नवमी २७ अक्तूबर
देवोत्थान एकादशी २९ अक्तूबर
कार्तिक पूर्णिमा २ नवम्बर
सोमवारी अमावश्या व्रत १६ नवम्बर
विवाह पंचमी २१ नवम्बर
षा० रवि व्रतारम्भ २२ नवम्बर
नवान्न पार्वण २५ नवम्बर
नरक निवारण चतुर्दशी व्रत १२ जनवरी
मकर संक्रान्ति १४ जनवरी
सरस्वती पूजा २० जनवरी
अचला सप्तमी २१ जनवरी
शिवरात्रि व्रत १२ फरवरी
होलिकादहन २८ फरवरी
होली १ मार्च
वारुणी योग १३ मार्च
सोमावती अमावश्या व्रत १५ मार्च
वा० नवरात्रारम्भ १६ मार्च
वा० छठिव्रत २१ मार्च
रामनवमी व्रत २४ मार्च
मेष संक्रान्ति १४ अप्रैल
जूड़शीतल १५ अप्रैल
षा० रविव्रतान्त २५ अप्रैल
जानकी नवमी २२ मई
वटसावित्री व्रत १२ जून
गंगा दशहरा २१ जून
श्री जगन्नाथ रथ यात्रा १३ जुलाई
हरिशयन एकादशी व्रत २१ जुलाई
आषाढ़ी पूर्णिमा २५ जुलाई

१४१७ (२००९-२०१० ई०) सालक शुभ-दिनक सूची

उपनयनक दिन

२०१० जून में २१ व २२

विवाहक दिन

२००९ नवम्बर में १९, २२, २३, २७
२०१० मई में २८ व ३०
२०१० जून में २, , , , , १३, १७, १८, २०, २१, २३, २४, २५, २७, २८, ३०
२०१० जुलाई में १, , , १४

द्विरागमनक दिन

२००९ नवम्बर में १८, १९, २३, २७, २९
२००९ दिसम्बर में २, ,
२०१० फरवरी में १५, १८, १९, २१, २२, २४, २५
२०१० मार्च में १, ,

मुंडन क़े दिन

२००९ नवम्बर में १८, १९, २३
२००९ दिसम्बर में ३
२०१० जनवरी में १८, २२
२०१० फरवरी में ३, १५, २५, २६
२०१० मार्च में ३,
२०१० जून में २, २१
२०१० जुलाई में १

दूर्वाक्षतक मंत्र:

ॐआब्रह्मनब्राह्मणोंब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यौsतिव्याधि महारथी जायताम दोघ्री धेनुर्वोढा sनड्वानाशुः सप्ति पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवाsस्ययजमानस्य वीरोजायाताम निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधयः पच्यन्ताम योगक्षेमोनः कल्पताम् मंत्रार्था: सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रुणां बुद्धिनाशोsस्तु मित्राणामुदस्तव।

बाजसनेयीकेरयज्ञोपवीतमंत्र

ॐ यज्ञोपवीतम परमं पवित्रं प्रजा पतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुंञ्च शुभ्रं। यज्ञोपवितम् बलमस्तुतेज:।।

साभार : इसमाद